श्री सिद्धार्थ श्रीनिवासन

श्री सिद्धार्थ श्रीनिवासन, सीईओ, लुपिन डिजिटल हेल्थ (LDH), तकनीक के माध्यम से रोगियों के बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने पर केंद्रित डिजिटल थेरेप्यूटिक्स पहलों का नेतृत्व कर रहे हैं। टेक-ड्रिवन व्यवसायों को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने का अनुभव रखने वाले वे इससे पहले एक दशक तक टाटा समूह से जुड़े रहे। उन्होंने एस.पी. जैन से पीजीडीएम और वीएनआईटी से बी.टेक की डिग्री प्राप्त की है। डॉ. सौम्या सिंह, क्रिएटिव एडिटर, उनसे स्वास्थ्य सेवा में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स की भूमिका पर बातचीत कर रही हैं।

भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स किस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं को बदल रहे हैं?

डिजिटल थेरेप्यूटिक्स भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के परिदृश्य को तेजी से बदल रहे हैं।

  • शहरी क्षेत्रों में टेलीहेल्थ और मोबाइल हेल्थ सॉल्यूशन्स का व्यापक रूप से उपयोग हो रहा है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में भी धीरे-धीरे टेलीहेल्थ और डिजिटल थेरेप्यूटिक्स का अपनापन बढ़ रहा है, क्योंकि लोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं तक पहुँच बनाना चाहते हैं।

अब ध्यान संक्रामक रोगों से हटकर गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) पर केंद्रित हो गया है, जिनमें कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियाँ (जैसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह) शामिल हैं। इन स्थितियों से भारत की बड़ी आबादी प्रभावित है, और डिजिटल थेरेप्यूटिक्स इन्हें नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसके अलावा, श्वसन रोग, महिला स्वास्थ्य, कैंसर, नवजात शिशु देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय प्रगति हो रही है।

कार्डियोलॉजी (हृदय रोग विज्ञान) में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स की क्या भूमिका है?

हृदय रोगों में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स तीन प्रमुख पहलुओं में मददगार हैं:

  • सक्रिय निगरानी (Active Monitoring): मरीज अपने लक्षण और महत्वपूर्ण संकेत (Vitals) वास्तविक समय में साझा कर सकते हैं, जिससे सही समय पर हस्तक्षेप संभव होता है।
  • अनुपालन (Adherence): यह सुनिश्चित करता है कि मरीज नियमित रूप से दवा लें और समय-समय पर चेकअप करवाएँ।
  • जागरूकता और पुनर्वास (Awareness & Rehabilitation): मरीजों को जीवनशैली सुधारने और रिकवरी में व्यापक सहायता प्रदान की जाती है।

डिजिटल थेरेप्यूटिक्स प्लेटफ़ॉर्म में डेटा गोपनीयता और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?

  • कानूनों का पालन: भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल और अमेरिका में HIPAA जैसे नियम।
  • सूचना सुरक्षा प्रणाली: ISO 27001 जैसे मानकों के अनुसार।
  • नियमित ऑडिट और जाँच।
  • डेटा एन्क्रिप्शन और सीमित एक्सेस।
  • सुरक्षित क्लाउड सेवा प्रदाताओं के साथ साझेदारी।
  • मरीजों को अपने डेटा पर नियंत्रण: वे चाहें तो जानकारी एक्सेस या डिलीट कर सकते हैं।

AI एकीकरण डिजिटल थेरेप्यूटिक्स की प्रभावशीलता कैसे बढ़ा रहा है?

  • प्रीडिक्टिव मॉडल्स: संभावित स्वास्थ्य समस्याओं का पहले से अनुमान।
  • नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग: चैटबॉट्स और वर्चुअल असिस्टेंट्स मरीजों के सवालों का जवाब देते हैं।
  • क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट: डॉक्टरों को मरीज की जानकारी का सारांश और व्यक्तिगत इलाज योजनाएँ सुझाना।
  • जोखिम मूल्यांकन (Risk Assessment): री-अडमिशन या जटिलताओं की संभावना का अनुमान।
  • कंप्यूटर विज़न: स्मार्टफोन इमेज से बीमारियों का आकलन।

आने वाले 5–10 वर्षों में कौन-सी नई तकनीकें डिजिटल थेरेप्यूटिक्स पर सबसे बड़ा प्रभाव डालेंगी?

  • वेयरेबल्स (Wearables): स्मार्टवॉच और अन्य उपकरणों का व्यापक उपयोग।
  • गैर-आक्रामक मॉनिटरिंग: बिना सुई या कफ के ब्लड प्रेशर और ग्लूकोज की निगरानी।
  • AI-आधारित बिहेवियरल मॉडल्स: बेहतर अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु।
  • कंप्यूटर विज़न: व्यायाम की सही तकनीक पर वास्तविक समय फीडबैक।
  • ऑगमेंटेड रियलिटी (AR): मरीज शिक्षा और सर्जिकल प्लानिंग में उपयोग।

भारत और वैश्विक स्तर पर डिजिटल थेरेप्यूटिक्स बाजार का भविष्य कैसा है?

  • भारत में: AI-आधारित हेल्थकेयर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है।
  • वैश्विक स्तर पर: वेयरेबल्स का बाजार उल्लेखनीय रूप से बढ़ने की संभावना है।
  • वर्तमान में स्वास्थ्य सुविधाओं में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स का उपयोग अभी भी कम है, जिससे वृद्धि की अपार संभावना है।

हृदय रोगों की देखभाल में डिजिटल थेरेप्यूटिक्स का दृष्टिकोण क्या है?

विशेषज्ञ टीम (केयर मैनेजर, न्यूट्रिशनिस्ट, व्यायाम विशेषज्ञ)।

  • मरीज, डॉक्टर और देखभालकर्ताओं के लिए ऐप इकोसिस्टम।
  • मान्यता प्राप्त चिकित्सा उपकरणों का एकीकरण।
  • पोस्ट-प्रोसीजर से लेकर क्रॉनिक कार्डियक कंडीशन्स तक की देखभाल।
  • एविडेंस-बेस्ड केयर: नवीनतम क्लिनिकल गाइडलाइन्स पर आधारित।

डिजिटल थेरेप्यूटिक्स स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती कैसे बनाते हैं?

  • दूरस्थ परामर्श और मॉनिटरिंग, अस्पताल जाने की आवश्यकता कम।
  • विशेषज्ञों तक पहुँच, खासकर डॉक्टरों की कमी वाले क्षेत्रों में।
  • यात्रा और आवास जैसे छिपे हुए खर्चों में कमी।
  • नियमित देखभाल के बीच निरंतर समर्थन, जिससे जटिलताओं से बचाव।
  • AI और तकनीक के ज़रिए बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत देखभाल।
  • मरीजों को आत्म-प्रबंधन के लिए ज्ञान और उपकरण उपलब्ध।

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